इस Moral Story In Hindi मैं आप लोगों को जो कहानी न लिखने वाला हूं उसे पढ़कर आप लोग बहुत ही कुछ सीख सकते हैं और आने वाली इस दुनिया में अच्छी तरह से मिल जुल सकते हैं।

हमें पता है कि बच्चे बहुत ही शरारती होते हैं इसलिए इस Moral Story In Hindi और उन्हें काबू में करना हर एक माता-पिता और दादा-दादी का सपना होता है इसलिए उन्होंने कहानियां सुना करके डरा करके और साहसी पूर्वक भी कहानी सुनाते हैं।

जिससे बच्चे आगे चलकर एक बहुत ही अच्छा व्यक्ति बनता है और अपने घर परिवार को आगे ले जाने में सहायता प्रदान करता है। तो आप लोग नीचे दिए गए Moral Story In Hindi को पढ़िए और एक अच्छी सी शिक्षा प्राप्त कीजिए तो चलिए शुरू करते हैं।

लालची आदमी की कहानी(Moral Story In Hindi)

इस Moral Story In Hindi में एक लालची आदमी की कहानी है। उस आदमी को लालच का क्या परिणाम भोगना पड़ता है। ये इस शिक्षाप्रद कहानी में बताया गया है।

एक समय की बात है, हथुआ नामक नगर में एक लालची आदमी रहा करता था। उसके पास अपार धन दौलत होने के बावजूद भी उसे और धन प्राप्ति की लालसा बनी रहती थी।

Desi khani — Moral Story In Hindi – Best 10 Desi Kahani in Hindi
Moral Story In Hindi – Best 10 Short Story in Hindi

एक दिन की बात है ,हथुआ नगरी में एक चमत्कारी संत की आगमन हुआ। जब इस लालची आदमी को उस चमत्कारी आदमी के बारे में पता चला। तो यह लालची आदमी दौड़े-दौड़े उनके पास गया।

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वह आदमी ने चमत्कारी संत को अपने घर आने की आमंत्रित दिया और फिर उनका बहुत ही अच्छे तरह से संस्कार किया। चमत्कारी संत उस आदमी से प्रसन्न होकर नगर से प्रस्थान होने से पूर्व उसे 4 दीपक दिया।

उन सभी दीपक को दे करके संत ने कहा:,”पुत्र, जब भी तुम्हें धन की आवश्यकता हो तुम इसमें से पहले दीपक को जला देना। और पूर्व दिशा की ओर चलते जाना, जहां पर यह दीपक भूल जाए। तुम उस जगह की जमीन को खोद लेना। वहां पर तुम्हें निश्चित ही धन की प्राप्ति होगी।

अगर फिर से तुम्हें धन की आवश्यकता पड़ी तो तुम इस में दिए हुए दूसरे दीपक को भी जला देना। और उस दीपक को लेकर पश्चिम दिशा की ओर बढ़ते जाना जब तक यह दीपक ना बुझ जाए। और जिस स्थान पर यह दीपक बजेगा तुम्हें वहां पर जमीन में बहुत ही अपार धन-संपत्ति की प्राप्ति होगी।

अगर अभी तुम्हारी धन की संपत्ति की आवश्यकता अभी पूरी नहीं हुआ हो तो, तुम्हारे पास उपस्थित तीसरी दीपक को भी जला देना और दक्षिण दिशा की तरफ बढ़ते जाना जहां पर यह दीपक बुझ जाए वहां पर तुम खुदाई करके बहुत सारी अपार धन-संपत्ति पा सकते हो।

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“और फिर संत ने कहा”, अंत में तुम्हारे पास एक दीपक और एक दिशा शेष बची रहेगी। लेकिन इसमें तुम्हें ना उस दीपक को जलाना है, और नहीं किसी दिशा में भी जाना है।

बस इतना ही कह कर के संत उस आदमी के घर से तथा उस हथवा नगर के बाहर से भी चले गए। अभी इधर यह लालची आदमी ने संत के जाते ही तुरंत पहले दीपक को जला दिया। और पूर्व दिशा की ओर चलने लगा।

पूर्व दिशा में कुछ दूर चलने के बाद से एक जंगल में वह दीपक जाकर के बुझ गया, वह लालची आदमी उस जगह पर खुदाई किया तभी एक उसे सोने की कलश मिले। और वह कलश पूरी तरह से सोने और हीरे जवाहरात उसे भरी हुई थी।

फिर उस लालची आदमी को विचार आया कि, पहले दूसरी दिशाओं का धन प्राप्त कर लेता हूं। और फिर यहां का धन ले जाऊंगा। और फिर सेवा सोने से भरी हुई कलश वहीं झाड़ियों में छुपा दिया।

और अधिक धन प्राप्ति के लिए , यह लालची आदमी ने दूसरी दीपक को जला दिया। और उस दीपक को लेकर पश्चिम की दिशा में चलने लगा। वाह दीपक एक सुनसान जगह पर जाकर बुझ गया। वह लालची आदमी उस जमीन की खुदाई की तो उसे एक  संदूक मिला। जो सोने के सिक्कों से भरा हुआ था।

यह लालची आदमी ने उस संदूक से भरी सोने के सिक्के को उसी गड्ढे में छोड़ दिया कि इसको बाद में आकर के ले करके जाऊंगा।

अब वह लालची आदमी ने तीसरे दीपक को जलाया, और दक्षिण दिशा की तरफ बढ़ने लगा। लेकिन वह दीपक एक पेड़ के नीचे बुझा। फिर वह लालची आदमी वहां पर जमीन की खुदाई की तो उसे एक हीरे मोती से भरा हुआ घड़ा मिला।

अब इतना धन पा करके वह लालची आदमी बहुत प्रसन्न हुआ, लेकिन उसका लालच बहुत ज्यादा बढ़ चुका था। और संत के मना करने के बावजूद भी वह लालची आदमी चौथे दीपक को जलाकर उत्तर दिशा में जाने का निर्णय लिया।

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उस लालची आदमी को लगा कि इस चौथी दीपक के स्थान पर हमें खुदाई करने पर बहुत ही अपार धन की प्राप्ति होगी। लेकिन उस धन को संत स्वयं रखना चाहता है। इसलिए मुझे तत्काल जाकर के उस स्थान पर खुदाई करके वहां से उस धन की प्राप्ति कर लेनी चाहिए। और फिर मैं अपनी जिंदगी पूरी  आराम से बिता लूंगा।

वह लालची आदमी ने उस अंतिम दीपक को जला दिया और उत्तर दिशा की ओर बढ़ने लगा। चलते चलते वह एक महल के सामने पहुंचा ,और वही पर वह दीपक भी बुझ गया।

अंतिम दीपक के बुझाने के बाद से वह लालची आदमी उस महल के दरवाजे को खोल लिया। और महल के भीतर प्रवेश कर महल के कक्षों में धन की तलाशी करने लगा।

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उसने एक कक्ष में सोने और हीरे से भरी हुई पूरी भंडार देखा। जिसे देख कर उसकी आंखें अचंभित रह गई। और फिर उसे दूसरे कक्ष में सोने का भंडार मिला। अपार धन देखकर उस लालची आदमी के मन में और लालच बढ़ने लगा।

अपार धन का लालच देख उसकी लालच और बढ़ने लगी। लेकिन कुछ दूर आगे जाने के बाद से उसे चक्की चलने की आवाज आ रही थी। आश्चर्यचकित होकर उस दरवाजे को खोला। वहां उसे एक वृद्ध आदमी चक्की पीसते हुए दिखा।

क्या लालची आदमी ने उस व्यक्ति से पूछा यहां कैसे पहुंचे बाबा ?

वह वृद्ध आदमी ने बोला”: क्या तुम थोड़ी देर के लिए इस चक्की को चलाओगे,”जरा मैं थोड़ा सा सांस ले लूं। फिर तुम्हें पूरी बात बताता हूं कि मैं यहां कैसे पहुंचा और मुझे यहां क्या मिला ,यह सब वृद्ध आदमी ने बोला :,

उसने सोचा कि इस वृद्ध आदमी से यह जानकारी हमें प्राप्त हो जाएगी की इस माहौल में और भी धन कहां-कहां पर है। और वह उस ब्रिज आदमी की बात मानकर उस चक्की को चलाने लगा। तभी इधर यह वृद्ध आदमी उठ खड़ा हुआ और जोर जोर से हंसने लगा।

उसे हंसता देख वह लालची आदमी ने पूछा”, ऐसे क्यों हंस रहे हो। यह कह कर वह चक्की बंद करने लगा।

“अरे अरे, चक्की बंद मत करना. अब से यह महल तेरा है। और अब इस पर तेरा अधिकार है। और साथ ही इस चक्की पर भी। अब यह चक्की तुम्हें हर समय चलाते रहना है। क्योंकि चक्की बंद होते ही यह महल गिर जाएगा। और तुम दबकर इसमें मर जाओगे।

फिर एक गहरी सांस लेकर के वृद्ध आदमी ने बोला:, संत की बात ना मान करके मैं भी वह आखरी दीपक जला कर के इस माहौल में पहुंच गया था। और तब से यह चक्की चला रहा हूं। और अभी तक मेरी पूरी जवानी चक्की चलाने में निकल गई है। बस इतना कह कर के वह वृद्ध आदमी वहां से जाने लगा।

दादी के द्वारा 

“जाते-जाते बस इतना तो बता दो कि इस चक्की से हमें छुटकारा कैसे मिलेगा। वह लालची आदमी पीछे से चिल्लाया। फिर वह वृद्ध आदमी बोला”, जब तक मेरे और तुम्हारे जैसे कोई रूप में अंधा व्यक्ति अंधा होकर यहां तक नहीं आएगा।

तब तक तुम्हें इस चक्की से छुटकारा नहीं मिलेगा। बस इतना कह कर के वह वृद्ध आदमी वहां से चला गया।

शिक्षा:, इस Moral Story In Hindi से हमें यह शिक्षा मिलती है कि लालच बुरी बला है इसलिए हमें लालच नहीं करना चाहिए हमें मेहनत करना चाहिए और मेहनत पर विश्वास करना चाहिए।

अंधा आदमी और लालटेन(Moral Story In Hindi of The Blind man with a lamp)

इस Moral Story In Hindi मैं आपको एक अंधा आदमी और लालटेन से वह आदमी कैसे अपनी जिंदगी गुजार रहा है इसकी पूरी जानकारी मिलेगी।

हम जानते हैं कि इस दुनिया में बहुत ही अजीबो गरीब लोग रहते हैं। बहुत सारे ऐसे लोग होते हैं जो अपनी कमजोरियों की भी नजर अंदाज कर देते हैं। लेकिन दूसरे की कमजोरियों की उपहास उड़ाने में तत्पर रहते हैं।

Desi khani — Moral Story In Hindi – Best 10 Desi Kahani in Hindi
Moral Story In Hindi – Best 10 Short Story in Hindi

और बिना किसी भी वास्तविकता के अनुमान लगाए बिना ही किसी दूसरे की कमजोरियों का मजाक उड़ाते हैं। और अपने पीके बातों से उन्हें ठेस पहुंचाने की कोशिश करते हैं। लेकीन जब उन्हें यथार्थ का तमाचा पड़ता है। तो सिवाय ग्लानि के उनके पास कुछ नहीं बचता है।

आज हम आपको इसमें एक अंधे व्यक्ती की कहानी बताने वाला हूं। जिसे ऐसे ही लोगो के उपहास का पात्र बनना पड़ा था।

एक चकिया नामक गांव में एक अंधा आदमी रहता था। और वह रात में जब भी बाहर जाता था तो एक जलती हुई लालटेन अपने साथ जरूर रखता था।

एक रात की बात है वह अपने दोस्त के घर भोजन करके अपने घर आ रहा था। और हमेशा की तरह उसके हाथ में एक जली हुई लालटेन थी। वहां पर कुछ शरारती बच्चों ने जब उसके हाथ में लालटेन देखा, उस पर हंसने लगे और फिर उस पर व्यंग बाण चलाने लगे। अरे यार यह देखो अंधा लालटेन लेकर के जा रहा है। भला इस अंधे को लालटेन का क्या काम है ?

उनकी बातों को सुनकर वह अंधा आदमी वही ठिठक गया और विनम्रता पूर्वक जवाब देते हुए कहा”, सही कहते हो भाइयों मैं तो अंधा हूं मैं तो देख नहीं सकता हूं। और मेरी दुनिया में तो सदा से अंधेरा ही रहा है। और मुझे लालटेन का क्या काम ?

मेरी आदत तो अंधेरे में ही जीने की है। लेकिन आप जैसे आंखें वाले लोगों को तो अंधेरी में जीने की आदत नहीं होती। और आप लोगों को अंधेरे में देखने में समस्या हो सकती है। और कहीं आप जैसे लोग अंधेरे में मुझे कहीं देख ना पाए। और धक्का दे दे,

तो मुझ बेचारे का क्या होगा ? इसलिए यह लालटेन आप लोगों के लिए लेकर के चलता हूं। कि आप जैसे लोग इस अंधे आदमी को अंधेरे में भी देख सकें।

इस अंधे व्यक्ति की बात सुनकर वह सभी लड़के शर्मसार हो गए और लजीज हुए। और फिर उस अंधे आदमी से क्षमा मांगे। और फिर उन्होंने प्रण किया कि बिना सोचे समझे भविष्य में वह किसी से कुछ नहीं कहेंगे।

शिक्षा:”, इस Moral Story In Hindi से हमें यह शिक्षा मिलती है कि हमें कभी भी किसी भी व्यक्ती को नीचा दिखाने की कोशिश नहीं करनी चाहिए और कुछ भी कहने से पूर्व सोच विचार कर बोलना चाहिए।

अहंकार का फल:– मूर्ति बनाने वाले की कहानी (Moral Story In Hindi)

इस Moral Story In Hindi मैं अहंकार ना करने और विनम्र बनने में सहायता प्रदान करती है जिसे पढ़कर के आपको एक बहुत ही अच्छी शिक्षा मिलेगी।

एक समय की बात है एक दिसदोली नामक गांव में एक मूर्तिकार रहता था। मूर्तिकला के कारण बहुत ही ज्यादा प्रेम के कारण उसने अपना पूरा जीवन मूर्तिकला को समर्पित कर दिया था।

इसके परिणाम स्वरूप इतना अच्छा मूर्तिकार हो गया था कि उसके द्वारा बनाई गई हर एक मूर्ति जीवंत प्रतीत होती थी।

उसके द्वारा बनाई गई मूर्तिकला को देखने वाली पूरी पूरी भरकर प्रशंसा करते थे, और साथ ही उसकी कला के चर्चा उसके गांव ही नहीं, बल्कि दूर-दूर के नगर और गांव में भी होने लगे थे।

ऐसी स्थिति में जैसा सामान्यता होता है वैसे ही  इस मूर्तिकार के साथ भी हुआ, और उसके भीतर धीरे-धीरे अहंकार की भावना जागृत हो गई। और वह अपने इलाके का सर्वश्रेष्ठ मूर्तिकार मानने लगा।

लेकिन उम्र बीतने के बाद जब उसका अंत समय निकट आने लगा। तो अब वह मृत्यु से बचने के लिए युक्ति खोजने लगा। और वह किसी भी तरह करके यम देव की दृष्टि से अपने आप को बचाने की कोशिश करने लगा। ताकि वह उसके प्राण ना हर ले।

अंततः उसे एक युक्ति सूज गई, उसने अपनी बेशुमार मूर्तिकला का प्रदर्शित करते हुए, 20 मूर्तियों का निर्माण किया। और वह सभी मूर्तियां देखने में हूं बहू उसके समान ही थी।

निर्मित होने के बाद से सभी मूर्तियां इतनी जीवंत प्रतीत होने लगी कि मूर्तियों और मूर्तिकारों में कोई अंतर ही ना रहा।

मूर्तिकार और मूर्तियों के बीच जाकर बैठ गया। उसके युक्ति के अनुसार यमदेव को इन मूर्तियों के बीच उसे पहचान पाना मुश्किल था।

उसकी युक्ति कारगार भी सिद्ध हुआ। जब यमदूत उसके प्राण हरने आया, तो 11 एक तरीके की मूर्ति को देख कर चकित रह गए। और वह उन मूर्तियों में अंतर पाने में असमर्थ थे। लेकीन उन्हें ज्ञात हुआ कि इसी मूर्तियों में मूर्तिकार छिपा बैठा हुआ है।

मूर्तिकार के प्राण हरने के लिए उसके पहचान पाना आवशयक था। उसके प्राण न हरने का अर्थ था:– प्रकृति के नियम के विरुद्ध जाना। और प्रकृति के नियम के अनुसार मूर्तिकार के अंत का समय आ चुका था।

मूर्तिकार की पहचान करने के लिए हर मूर्ति को वह तोड़ सकता था। किंतु वह कला का अपमान नहीं करना चाहता था। यमदूत इस समस्या से निपटने के लिए एक अलग ही प्रकार की तोड़ निकाला।

यमदूत को मूर्तिकार के आकार का बोध था। अतः उसकी अहंकार पर चोट करते हुए बोला:– वास्तव में मूर्तियां कलाक्मतकता और सौंदर्य से अद्भुत बनाई गई है। लेकीन मूर्तिकार एक गलती कर बैठा है। यदि वे मेरे सम्मुख होता तो मैं उसके गलतियों से पहचान कराता।

अपनी मूर्ति की गलती की बात सुन उस मूर्तिकार को अपने अंदर का अहंकार जग गया। और उससे रहा नहीं गया। और झट से उठ बैठता है, और यमदूत से बोलता है कि”, त्रुटी “, यह तो संभव नहीं है। मेरे द्वारा बनाई गई मूर्तियां सदैव त्रुटिरहित होती हैं।

और इस तरह से यमदेव की युक्ति काम कर चुकी थी”, उसने मूर्तिकार को पकड़ लिया और बोला”, बेजुमान मूर्तियां कभी बोल नहीं सकती हैं और तुम बोल दिए। यही तुम्हारा त्रुटि है कि तुम अपने अहंकार पर कोई बस नहीं कर सकते।

शिक्षा: इस Moral Story In Hindi से हमें यह शिक्षा मिलती है कि अहंकार विनाश का कारण है इसलिए इसे कभी भी अपने ऊपर हावी नहीं होने देना चाहिए।

बगुला भगत की कहानी(Moral Story In Hindi)

इस Moral Story In Hindi में एक बगुला के बारे में जानेंगे, एक समय की बात है एक बहुत ही घने वन में एक तालाब स्थित था जिसमें मछलियां केकड़े ,कछुए, मेंढक पता ना–ना प्रकार के जीव जंतु उस में रहा करते थे। तथा उसी तालाब के किनारे एक बुड्ढा बगुला भी रहा करता था।

वह बुड्ढा बगुला तालाब में उपस्थित मछलियों पर निर्भर रहता था, वह तालाब के किनारे घाट लगाए बैठा रहता था। और जैसे ही कोई मछली उसे नजर आती थी तुरंत उसे पकड़ लेता ,और अपने पेट की ज्वाला को शांत करता था।

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लेकिन समय के अनुसार धीरे-धीरे उसकी आंख कमजोर पड़ने लगी और उसे अब थोड़ा-थोड़ा दिखाई नहीं पड़ने लगा। यह उसके लिए बहुत ही दुश्वार हुआ।

वह बुड्ढा बगुला नदी के किनारे बैठकर एक पैर पर सोचते रहता था, कि ऐसी हालत में भोजन की व्यवस्था कैसे किया जाए।

कुछ दिन बीतने के बाद उस बगुले को एक युक्ति  सूझी, वह बगुला अपने युक्ति के अनुसार नदी के किनारे गया और एक टांग पर खड़ा होकर जोर-जोर से विलाप करने लगा। बगुले की इस तरह विलाप करने पर तलाब में उपस्थित केकड़ा आश्चर्यचकित हो गया

और फिर उसके पास आया ,और बोला” बगुला मामा क्या” बात है। आप इस तरह आशु क्यों बहा रहे हो ? क्या आज कोई मछली हाथ नहीं लगी क्या ?

बगुला बोला,”बेटा” कैसी बातें कर रहे हो अब मैं बैरागी का जीवन अपना लिया हूं। और मछलियों तथा अन्य जीव का शिकार करना छोड़ दिया हूं। और वैसे भी इस पहला के किनारे मुझे रहते वर्षों हो गए।

इस तालाब में रहने वाले जल जीवो के प्रति मेरे मन में प्रेम और अपनत्व का भाव जाग चुका है। इसलिए मैं उन सभी का प्राण नहीं हर सकता।

तो इस तरह विलाप करने का क्या कारण है “,मामा,” केकड़े ने उत्सुकतावश पूछा,”

“अरे मैं तो इस तालाब में रहने वाले अपने भाई बंधुओं के लिए विलाप कर रहा हूं। कि आज ही मैंने एक जाने-माने ज्योतिषी को यहां पर भविष्यवाणी करते हुए सुना कि इस क्षेत्र में 15 वर्षों के लिए अकाल पड़ने वाली है।

और यहां उपस्थित सभी जला से सूख जाएंगे। हर उस में रहने वाले जीव– जंतु भूख –प्यास से मर जाएंगे। और साथ ही आसपास के सभी छोटे जलाशयों के जीव– जंतु किसी बड़े जलाशय की ओर प्रस्थान कर रहे हैं।

लेकिन इस तालाब के जीव जंतु निश्चिंत बैठे हुए हैं। और उन्हें इस बात का आभास भी नहीं है। और अब इस जलाशय का जल स्तर अत्यंत कम हो चुका है। और सूखा पड़ने पर यह अति शीघ्र सूख जाएगा। और इस तालाब में रहने वाले सभी जलचर मारे जाएंगे। और यही सोचकर मेरे आंसू नहीं थम रहे हैं।

बगुले की इस बात को सुनते ही केकड़ा तालाब में रहने वाले जलचर तथा मछलियों के पास गया। और उन्हें बगुले की अकाल संबंधी बातें बता दी।

यह बात सुनते ही जल में उपस्थित सभी जलचर बगुले  के पास पहुंच गए। और उससे इस समस्या से निपटने के लिए उपाय पूछने लगे।

बस दुष्ट बगुला तो इसी अवसर की तलाश में था।”बगुला बोला चिंता की कोई बात नहीं है “बंधुओं”यहां से कुछ ही दूर एक जलाशय जल  से लबालब भरी हुई है। और वह बहुत ही बड़ी तालाब है।

वहां काजल अगले 50 वर्षों तक सूखने का कोई चांस ही नहीं है। और मैं तुम लोगों को अपनी पीठ पर लादकर उस तालाब में छोड़ दूंगा। और इसी तरह तुम सभी लोगों की जान बच जाएगी।

बबली की आवाज सुन सभी जलचरों में पहले जाने की होड़ लग गई। और भी जल्दी जाने के लिए बगुला से विनती करने लगे।”बबला मामा”हमें वहां सबसे पहले पहुंचा दो”

यह देख बगुले की बांछें खिल गई। उसने सब को शांत किया और बोला”, बंधुओं”मैं तुम सभी को एक-एक करके अपनी पीठ पर लादकर उस बड़ी झील में ले जाऊंगा। फिर चाहे मेरा जो हाल हो, आखिर तुम सब मेरे अपने ही तो हो।

उस दिन के बाद से बगुला प्रतिदिन एक मछली को अपने पीठ पर लाद कर ले जाता था। और कुछ दूरी तय करने के बाद से एक बड़ी सी शीला पर उसे पटक कर मार डालता था। फिर छिककर अपने पेट भरने के बाद दूसरे दिन दूसरा शिकार अपनी पीठ पर लादकर चलते बना।

ऐसे ही कई दिनों तक बीत गया। और बगुले को रोज एक मछ्ली बिना परिश्रम के मिलने लगा। एक दिन अचानक जब बगुला तालाब के किनारे गया। तभी , केकड़ा बोला “, बगुला मामा,”आपने सुखा पड़ने की बात मुझे सबसे पहले बताई “, लेकीन अब तक आप मुझे उस बड़ी झील में ले कर नही गए। और आज मैं किसी का कुछ नहीं सुनुगा। और आज मुझे हो लेकर आपको जाना होगा।

अब इधर बगुला भी रोज मछली खाकर अब ऊब चुका था। और उसने सोचा कि क्यू नही आज केकड़े को ही अपना आहार बनाया जाए। और वह केकड़े को अपने गर्दन पर बैठा कर उड़ने लगा।

कुछ दूर जाने के बाद केकड़े ने देखा कि एक बड़ी शीला के पास मछलियों की हड्डियों तथा कंकालो का अंबार लगा था। उसे संदेह हुआ है हो न हो यह सब इस बगुले का ही किया धरा हो।

उसने बगुले मामा “से पुछा कि हमें और कितनी दूर जाने हैं। तुम मुझे उठाए उठाए थक गए होंगे।

शीला तक पहुंचने के बाद बगुले ने सोचा कि अब वास्तविकता बताने में कोई हर्ज नहीं है। उसने केकड़े को अपने सारी बातें बता दिया। और बोला,”केकड़े अब तुम ईश्वर का स्मरण कर ले। तेरा अंत समय आ चुका है। अब मैं तुम्हारे को भी इस बड़ी शीला पर पटक पटक कर मार डालूंगा। और तुम्हे अपना आहार बनाएगा।

इस बात को सुनते ही बगुले ने अपनें नुखिले दांत बगुले के गर्दन में लगा दिया। और फ़िर बगुले की गर्दन काट दिया। और वह वही तड़प कर मर गया।

केकड़ा । बगुले की कटी हुई गर्दन लेकर वापस तालाब में पहुंचा और दुष्ट बगुला के दुष्ट कहानी सभी तालाब में उपस्थित जलचरो को बताया। की अब वह दुष्ट बगुला मर चुका है। अब आप लोग यहां आनंद पूर्वक रह सकते हैं।

शिक्षा: इस Moral Story In Hindi से हमें यह शिक्षा मिलती है कि किसी भी बात पर बिना सोचे समझे विश्वास नहीं करना चाहिए। और मुसीबत के समय धैर्य से काम लेना चाहिए।

मूर्ख कछुआ की कहानी (Moral Story In Hindi)

इस Moral Story In Hindi में एक मूर्ख कछुआ के बारे में बताए गए हैं। एक समय की बात है एक तालाब में चेतन नामक एक कछुआ रहता था। और वह कछुआ बहुत ही बातूनी था। दूसरो से बात करते समय बीच बीच में टोका टोकी करना, यह उसकी आदत थी।

एक दिन दो हंस (swan 🦢) उस तालाब में उतरे उस दोनो हंसो का नाम नील और नार था। और उन्हे तालाब के आसपास का वातावरण बहुत ही अच्छा लगता था। उसके बाद से”वे दोनों प्रतिदिन वहा पर आने लगें।

चेतन कछुआ उन्हें प्रतिदिन देखता । और एक दिन वह चेतन कछुआ ने दोनो हंसो से बात किया। और वे दोनों उसे बहुत ही भले और सज्जन लगे। और शीघ्र ही उनमें गहरी मित्रता हो गया।

और हंस रोज वहा तालाब में आते थे और कछुआ से मिलते थे। फिर तीनों मिलकर नाना प्रकार के बाते बहुत देर तक किया करते थे। लेकीन बातों के बीच कछुआ की टोका – टोकी होते रहती थी। लेकीन सज्जन हंस उसे बुरा नहीं मानते थे।

बहुत समय बीतने के बाद एक समय उस जगह पर अकाल पड़ा। और वहा नदी – तलाब सूखने लगे। जहा मूर्खो कछुआ रहता था। तो एक दिन दोनों हंस उससे मिलने आए।

दोनो हंसो ने बताया कि वह अब इस जगह को छोड़कर दूसरे स्थान 80 किलोमीटर दूर एक अन्य तालाब में जा रहे हैं। जो पानी से लबालब हैं।

हंसो के इस बात को सुनते ही कछुआ बहुत दुःखी हुआ। और आखों में आशु भरकर बोला,”दोस्तों”, अब कुछ ही दिनों में यह तालाब सुख जायेगा। तो लगता हैं कि मेरा मरण अब निश्चित है। किंतु इस बात से ज्यादा हमें यह मैं अपनी अंतिम समय में अपने मित्रों से नही मिल पाऊंगा।

तभी कछुए की ऐसे बात को सुन दोनों हंस उदास हो गए। उन्हें कछुए से सहानुभूति थी।

वे बोले “, मित्र चेतन हम दोनों तुम्हें यहां छोड़ कर अकेले नहीं जायेगे। और अब हम तुम्हें भी अपने साथ ले जायेंगे। हमारी मित्रता और साथ सदा के लिए एक साथ बना रहेगा।

“, लेकीन यह कैसे संभव है दोस्तो”तुम दोनों तो उड़ चले जाओगे, और मुझे तो धीरे धीरे चल कर उस जगह पर जाने में महीनो से ज्यादा लग जाएंगे। और यह भी हो सकता है कि बीच रास्ते में ही मेरे प्राणपाखेरु ना हो जाए। तुम दोनों चले जाओ, मैं तुम दोनों को याद करके अपने दिन व्यतीत कर लूंगा।

हंसो ने कछुए की बात नहीं मानी, और उन्होने कछुए को अपने साथ ले जाने के लिए युक्ति सोचने लगे। और अंत में उन्हें एक अच्छी सी सुझाव मिल गया और वो खुश हो गए।

और फिर उन्होने तय किया है वे बांस की एक लकड़ी लेकर आयेगे। और कछुआ उस लकड़ी के मध्य भाग को अपने कछुआ अपनी मुंह से पकड़ लेगा। और वे दोनों लकड़ी के दोनों सिरों को अपने चोंच में दबा लेंगे। इस तरह वे कछुए को लेकर उड़ते हुए। उस झील तक वापस पहुंच जायेगे।

और कछुआ भी इस उपाय को सुन कर बहुत खुश हुआ। अगले दिन दोनो हंसो ने बांस की लकड़ी लेकर उस कछुए के पास आए। और कछुए को लकड़ी के मध्य भाग को मुंह से पकड़ लेने को कहा”, हंस कछुआ के बातूनी बातों से भली– भांति परिचित थे।

इसलिए दोनों हंसों ने उसे समझाया कि जब तक वे झील तक नहीं पहुंच जाते। तब तक वे उस कछुए को पुरी तरह मौन रहना है। अन्यथा वह निचे जमीन पर गिर जायेगा।

फिर कछुआ ने दोनो हंसो को आश्वासन दिया कि वह जब तक नही उस झील तक नहीं पहुंच सके। तब तक अपने मुंह को नही खोलेगा।

दोनों को सांत्वना देने के बाद वह लकड़ी के मध्य भाग को मुंह में पकड़ लिया। फिर हंस लकड़ी के दोनों किनारों को अपने चोंच में दबा कर उड़ने लगे।

वे दोनों हंस उड़ते हुए एक कस्बे के पास पहुंचा। तभी अचानक किसी ने आकाश में उड़ते हुए इस नजारे को देख लिया। और वह दूसरे लोगों को बताने लगा। की देखों देखो आज कछुआ भी में उड़ने लगा।

उस कछुए की यह बात एक मुंह से होते हुए पूरे कस्बे तक फैल गई। और फिर लोग घरों से बाहर निकल कर शोर मचाने लगा।

और लोगों की इस शोर को सुन कछुआ को रहा नहीं गया। और वे हंसो से कहा “: ये लोग हमें देख इतना शोर क्यो मचा रहे हैं।

इस बात को बोलते ही कछुए की मुंह से लकड़ी छूट गया। और वह सीधे जमीन पर गिर गया। और जमीन से टकराते हो उसके प्राण निकल गया और वह बातूनी कछुआ मर गया।

शिक्षा:–इस Moral Story In Hindi से हमें यह शिक्षा मिलती है कि हमें बुद्धिमान व्यक्ति हमेशा किसी काम को करने से पहले योजना बना कर उस पर अमल करते हुए सफलता प्राप्त करते हैं। नहीं तो योजना पर न टिके रहने का दुष्परिणाम भोगना पड़ता है।

अगर आप कोई सामूहिक कार्य कर रहे हो तो समूह के सभी सदस्यों की राय को महत्व देना आवश्यक है। उनकी राय न मानकर कार्य के नुकसान के साथ– साथ व्यक्तिगत नुकसान भी हो सकता है।

और मौके की नजाकत को देख कर ही सही समय पर मुंह खोलना चाहिए।

मगरमच्छ और बंदर की कहानी (Moral Story In Hindi)

इस Moral Story In Hindi लेख में मगरमच्छ और बंदर की कहानी पढ़ने को मिलेगा जो बहुत ही शिक्षा और साहसी बनने में सहायता प्रदान करती है।

एक समय की बात है एक घने जंगल में एक तालाब था। और उस तालाब के किनारे एक बहुत ही सुन्दर जामुन का पेड़ था। सीजन आने पर उसमे बहुत ही मीठे और रशीले जामुन लगा करते थे। जामुन का वह पेड़ एक नीलकमल नाम के एक बंदर का था।

Desi khani — Moral Story In Hindi – Best 10 Desi Kahani in Hindi
Moral Story In Hindi – Best 10 Short Story in Hindi

जब भी सीजन में जामुन के पेड़ पर जामुन लगता था तो बंदर बड़े ही मजे के साथ खाया करता था। उस बंदर का जीवन सुखमय था।

एक दिन एक मगरमच्छ तैरते तैरते हुए उस जामुन के पेड़ के निचे आ गया। जिस पेड़ पर बन्दर रहा करता था। जब बंदर ने उसे देखा तो उसके लिए कुछ जामुन तोड़ कर निचे गिरा दिया। इधर मगरमच्छ भूखा था। जामुन को खाकर उसकी भूख मीट  गया।

वह बंदर से बोला”, मैं बहुत ही भूखा था दोस्त”, और तुम्हारे दिए हुए जामुन ने मेरे भूख को शांत कर दिया। मित्र तुम्हारा बहुत सारे “धन्यवाद।

जब तुमने मित्र कहा है तो फिर इसमें धन्यवाद की बात क्या है ? तुम यहां रोज आ जाया करो। ये पेड़ तो हमेशा जामुनों से भरा हुआ रहता है। हम दोनों साथ में जामुनों का स्वाद लिया करेगें। बंदर ने बहुत ही मैत्री भाव से मगरमच्छ से कहा।

एक दिन दोनों में अपने – अपने परिवार के बारे में बाते करने लगें। तो बंदर बोला “, मित्र,”परिवार के नाम पर मेरा कोई नहीं है। मैं इस दुनियां में अकेला हूं। लेकीन तुम्हारे मित्रता के कारण मेरे जीवन का अकेलापन चला गया। मैं भगवान का बहुत ही आभारी हूं कि उसने मित्र,”के रुप में तुमको मेरे पास भेजा।

मगरमच्छ बोला,”मैं भी तुम्हें मित्र के रुप में पाकर मैं भी बहुत खुश हूं। लेकीन मैं यहां अकेला नहीं हूं मेरी पत्नी हैं। इस झील के पार हम दोनों साथ रहते हैं।

अरे,”ऐसी बात थी। तो पहले क्यूं नहीं बताया। मैं उनके लिए भी जामुन भेजता। यह बंदर ने कहा “और फ़िर उस दिन भी बंदर ने मगरमच्छ की पत्नी के लिए जामुन भेजवाए।

घर पहुंच कर जब मगरमच्छ ने अपनी को बंदर के दिए हुए जामुन दिया तो उसने पुछा कि पतिदेव जी इतना मीठा जामुन आप कहा से लेकर आए।

मगरमच्छ ने जवाब दिया यह जामुन मेरे मित्र बंदर ने दिया है। जो इस झील के पार उस झील के किनारे पेड़ पर रहता है।

“बन्दर और मगरमच्छ की मित्रता यह कैसी बातें कर रहे हों नाथ ? बन्दर और मगरमच्छ भी भला कभी एक दूसरे के दोस्त होते हैं। ओ बंदर तो हमारा आहार है। आप जामुन के स्थान पर उस बंदर को मार कर ले आते तो अच्छा होता। तो हम मिलकर उसके मांस का स्वाद दोनो लोग साथ में खाते। यह बात मगरमच्छ की पत्नी ने कहा “,

मगरमच्छ गुस्सा में कहा,”खबरदार जो आइंदा ऐसी बातें किया, तो बंदर मेरा मित्र है और रोज वह मुझे मीठे – मीठे जामुन खिलाता है। और मैं कभी भी उसका अहित नहीं कर सकता ,”और मगरमच्छ ने अपनी पत्नी को झिड़प दिया। और वह अपने मन को मसोसकर रह गई।

इधर मगरमच्छ और बंदर की मित्रता पूर्वरत रही। दोनो रोज मिलते रहे और दोनों रोज मीठे मीठे जामुन खाते रहे। तथा अब बंदर भी मगरमच्छ की पत्नी के लिए रोज जामुन भेजने लगा।

मगरमच्छ की पत्नी सोचती है कि रोज इतना मीठा जामुन खाता है तो वह बंदर का कलेजा कितना मीठा होगा। काश! मुझे उसका कलेजा खाने को मिल जाए। लेकीन डर के मारे वह अपने पति से कुछ नहीं कहती।

लेकिन जैसे– जैसे दिन गुजरते हैं वैसे – वैसे मगरमच्छ की पत्नी को बंदर का कलेजा खाने की जिज्ञासा बढ़ने लगी थी।

वह अपने पति से सीधे-सीधे बंदर के कलेजे की मांग नहीं कर सकती थी। इसलिए उसने एक तरकीब निकाली, एक शाम जब मगरमच्छ बंदर से मिलकर आया तो देखा कि उसकी पत्नी निढाल होकर पड़ी हुई है।

पूछने पर वह आंसू बहाते हुए बोली”, मेरी तबीयत बहुत खराब है, मुझे लगता है,”अब मैं नहीं बचूंगी। नाथ, मेरे बाद तुम अपना ख्याल रखना।

मगरमच्छ पत्नी से बहुत ज्यादा प्रेम करता था। उससे उसकी हालत देखी नहीं जा रही थी। वह दुखी होकर बोला ” प्रिय ? ऐसा मत कहो हम वैद्य के पास जाएंगे। और तुम्हारा इलाज करवाएंगे।

वह बोली मैं वैध के पास गई थी। लेकीन उसने जो मेरे बीमार का इलाज बताया है ? वह संभव नहीं है।

“तुम सही बताओं तो मैं तुम्हारा हर संभव इलाज करवाऊंगा।

और मगरमच्छ की पत्नी इसी तरह की अवसर की तलाश कर रही थीं। वह बोली “वैध ने कहा है कि मैं बंदर का कलेजा खाकर हो सकती हूं। अगर आप मुझे जिंदा चाहते हैं तो मुझे बंदर का कलेजा ला दीजिए।

ये तुम क्या बोल रही हों। मैं तुम्हें कह चुका हूं कि बंदर मेरा मित्र है। और मैं इसके लिए उसके साथ धोखा नहीं कर सकता हूं। और मगरमच्छ की पत्नी उसके बातों को मानने के लिए तैयार नहीं हुई।

“यदि ऐसे बात है तो तुम मेरा मरा हुआ मुंह देखने के लिए तैयार हो”मगरमच्छ की पत्नी रूठते हुए कहा”,

मगरमच्छ अब दुविधा में फस गया था। एक ओर उसका प्रिय मित्र तो दुसरी ओर उसकी अपनी पत्नी”, और फिर अंत में वह अपनी पत्नी का प्राण बचाने का निर्णय लिया।

वह दूसरे दिन सुबह – सुबह ही बंदर का कलेजा लाने निकल पड़े। और फिर उसके पत्नी फूली नहीं समाई और प्रतीक्षा करने लगे आने की।

जब मगरमच्छ बंदर के पास पहुंचा, तो बंदर ने बोला,”मित्र इतना सुबह– सुबह ही क्या कोई बात है क्या ?

मित्र,” तुम्हारी भाभी तुमसे मिलने के लिए लालायित हैं, वह मुझसे रोज शिकायत करती है कि मै तुम्हारे दिए जामुन तो रोज खा लेता हूं। लेकीन कभी तुम्हे घर बुलाकर तुम्हारा सत्कार नहीं करता।

और आज तुम्हें उसने भोज पर बुलाया है। और मैं सुबह – सुबह वही संदेश लेकर आया हूं। मगरमच्छ ने यह बात झूठ बोला,”

“मित्र, भाभी को मेरे तरह से धन्यवाद कहना और मेरा प्रणाम भी,”लेकीन मैं जमीन पर रहने वाला जीव है और तुम लोग जल में रहने वाले जीव हों। और मैं यह झील भी पार नही कर सकता हूं। और मैं कैसे तुम्हारे घर आ पाऊंगा। यह बंदर ने अपनी समस्या बताई।

“मित्र, तुम उसकी चिंता मत करो ? मै तुम्हें अपनी पीठ पर बैठा कर घर ले जाऊंगा।

फिर बंदर तैयार हो गया और मगरमच्छ के पीठ पर पेंड से उछल कर बैठ गया। फिर मगरमच्छों झील में तैरने लगा। जब मैं झील के बीचो बिच पहुंचे।

तुम मगरमच्छ ने सोचा कि अब बंदर को वास्तविकता बताने में कोई समस्या नहीं है। और जहां से वह वापस नहीं लौट सकता है।

वह बोला ,”मित्र” भगवान का रमण कर लो। और अब तुम्हारे जीवन की कुछ ही घड़ियां शेष है। मैं तुम्हें भोज नहीं बल्कि मारने के लिए ले जा रहा हूं।

यह बात सुनकर बंदर बड़ी ही चकित होकर बोला,”मित्र”मैंने तुम्हारा क्या बिगाड़ा है। जो तुम मुझे मारना चाहते हो। मैंने तो तुम्हें मित्र समझा और तुम ही जामुन भी खिलाया। और उसका प्रतिफल तुम मुझे मेरे प्राण ले कर के दे रहे हो।

मगरमच्छ ने बंदर को सारी बातें बताइए और बोला,”, मित्र”, तुम्हारी भाभी के जीवन के लिए तुम्हारी कलेजा बहुत ही आवश्यक है। और वह तुम्हारी कलेजा खाकर ही पूरी तरह से स्वस्थ हो जाएगी। और आशा है कि तुम मेरे विवस्ता को समझोगे।

फिर बंदर को मगरमच्छ की पत्नी की चालाकी पूरी तरह समझ में आ गई। बंदर को उस मगरमच्छ और उसकी पत्नी पर बहुत-बहुत क्रोध हुआ। लेकिन यह समय क्रोध को दिखाने का नहीं बल्की बुद्धिमानी से काम निकालने का था।

वह बंदर चतुर था तुरंत उसके दिमाग में अपने प्राण को बचाने के लिए एक युक्ति सूझ गई। और वह फिर मगरमच्छ से बोला,”मित्र तुमने पहले ही क्यों नहीं बताया कि भाभी को मेरा कलेजा खाना है। हम बंदर लोग अपने कलेजे को पेड़ की कोटा में बांध कर रखते हैं।

और मैं भी अपनी कलेजे को जामुन के पेड़ की कोटर में रखा हुआ है। अगर तुम मुझे भाभी के पास ले कर के भी जाओगे तो मुझे कलेजा नहीं मिलेगा। और फिर वह कलेजा नहीं खा पाएगी।

मगरमच्छ ने बोला: अगर बात ऐसी है तो मैं फिर तुम्हें उस पेड़ के पास लेकर के चलता हूं। फिर तुम अपनी कलेजा पेड़ शीला करके दे देना और मैं अपनी पत्नी को दे दूंगा जिससे वह बीमार से ठीक हो जाएगी। यह कहते हुए मगरमच्छ ने तुरंत अपनी दिशा को बदल लिया। और वापस जामुन के पेड़ की तरफ तैरने लगा।

जैसे ही बंदर झील के किनारे पहुंचा वह छलांग लगाकर के जामुन के पेड़ पर चढ़ गया। तभी नीचे से मगरमच्छ ने बोला मित्र तुम हमें अपना कलेजा दे दो। तुम्हारी भाभी हमें प्रतीक्षा कर रही होगी।

बंदर ने कहा,”मूर्ख क्या तुम्हें यह भी पता नहीं है कि किसी भी जीव का कलेजा उसके शरीर के अंदर ही होता है। चल भाग जा यहां से। तुम्हारे जैसे विश्वासघाती से मुझे कोई मित्रता की रिश्ता नहीं रखनी है। बंदर ने मगरमच्छ को धिकारते हुए बोला–

और फिर मगरमच्छ पछताने लगा कि मैंने अपने मन की भेद को बता करके बहुत ही गलत किया था। वह पुनः बंदर का विश्वास पाने के लिए बोला,”मित्र मैं तो तुमसे हंसी और ठिठोली कर रहा था। और तुम मेरी बातों को दिल पर मत लेना। चलो घर चलो तुम्हारी भाभी तुम्हारा इंतजार कर रही होगी।

फिर बंदर ने बोला,”दुष्ट में इतना भी मूर्ख नहीं हूं कि मैं तुम्हारी बातों में फिर से आ जाऊंगा। तुम जैसे विश्वासघाती किसी के मित्रता के योग्य नहीं है। चला जा यहां से और फिर कभी यहां पर मत आना। और यह बंदर मगरमच्छ को दुत्कारते हुए बोला।

फिर मगरमच्छ वहां से अपना उदास सा मुंह लेकर के वापस चला गया।

शिक्षा: इस Moral Story In Hindi मैं हमें यह शिक्षा मिलती है कि मित्र के साथ कभी भी धोखा नहीं करना चाहिए और संकट के समय बुद्धिमानी और धैर्य से काम निकालना चाहिए।

दो सिर वाली पक्षी की कहानी (Moral Story In Hindi)

इस Moral Story In Hindi में जिस कहानी को पढ़ने वाले हैं उसमें पक्षी के दो सीर होते हैं और उसके साथ क्या-क्या होता है कौन सी कौन सी परिस्थितियां गुजरती है इसके बारे में हम पढ़ने वाले हैं तो चलिए शुरू करते हैं।

एक घने जंगल में तनाब नाम की एक पक्षी रहा करती थी। और उसकी आकृति बाकी पक्षी की आकृतियों से विभिन्न ही प्रकार के थे। उसके शरीर तो एक थे लेकिन सिर्फ दो था। और उसके दोनों सिरों को आपस में एक दूसरे से नहीं बनती थी। और समय-समय पर उन दोनों में टकराव होते रहता था।

Desi khani — Moral Story In Hindi – Best 10 Desi Kahani in Hindi
Moral Story In Hindi – Best 10 Short Story in Hindi

एक दिन की बात है जंगल में टहलते हुए तहसील को एक बहुत ही रसीला और सबसे अच्छा फल दिखाई दिया। और वह लपक कर उसे पकड़ लिया और बड़े ही चाव से खाने लगा।

या देख उसके बाय सिर के भी मुंह में पानी आने लगा। उसने अपने दाएं मुख से पूछा”, तनिक में भी यह फल चक्कर देखू क्या ?

लेकिन दाएं मुख ने उसे मना कर  दिया”इसकी क्या आवश्यकता है मैं खाऊं या तुम। यह जाएगा तो हमारे ही पेट में और पेट तो हमारा एक ही है। वह तो भर ही जाएगा।

इस उत्तर को सुन बाय मुंह को बहुत ही ज्यादा क्रोध आ गया। और वह दाएं मुख से बदला लेने के लिए मौके की तलाश करने लगा।

और यह अवसर उसे प्राप्त भी हुआ। जब नदी किनारे पड़ा हुआ एक सुनहरा फल उसे दिखा। और यह फल व दाएं मुख को जलाते हुए अकेले ही खाना चाहता था। लेकिन जैसे ही वह उसे खाने के लिए गया। वही पस ही बैठा एक कौवा बोल चुका: कि दोस्तों इस फल को मत खाना उस फल में जहर है। और उसे खाते ही तुम लोग मर जाओगे।

यह बात सुनकर  दाए मुख ने बाय मुंह को चेतावनी दिया और समझाया और साथ ही उसे रोकने का प्रयास भी किया। लेकिन बाया मुख प्रतिशोध की आग में जल रहा था। और उसने दाएं मुख्य की एक भी ना सुनी। और वह उस फल को खा लिया। साथ ही फल खाते हैं ,वह पक्षी प्राण निकल गया और वह मर गया।

शिक्षा: इस Moral Story In Hindi कहानी से हमें यह शिक्षा मिलती है कि अगर हम कोई काम मिलजुलकर नहीं करते हैं तो वह काम नष्ट हो जाती है इसलिए हमें मिलजुल कर के रहना चाहिए और अपनी सभी कार्य को मिलजुल करके संपन्न करना चाहिए।

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